Saturday, 15 July 2017

कैसे जान पाओगे मुझको

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय

अगर तुमने प्रेम नही किया
तो कैसे जान पाओगे मुझको

किसी को जी भरकर नही चाहा
किसी के लिए नही बहाया
आँखों से नीर  रात भर
किसी के लिए अपना तकिया नही
भिगोया कभी
नही रही सीलन तुम्हारे कमरे
मे अगर कभी
तो कैसे जान पाओगे मुझको ||

हृदय के अंतः पटल से
अगर नही उठी कभी तरंगे
नही बिताई रात अगर
चाँद और तारो के साथ
नही सुनी कभी नज़्म
साहिर, फ़ैज़ ग़ालिब, मीर , मज़ाज़ की
तो फिर तुम ही बताओ
कैसे जान पाओगे मुझको ||

अगर तुम तड़पते  नही की जैसे
चातक तरसता है बारिश के लिए
या मछली पानी से बाहर आकर,
तुम एक समुंदर के बीच पानी चारो ओर
पर उसमे से पी नही सकते
दो घूट भी तुम, महसूस  नही  किया है
भीड़ मे भी अगर तन्हा नही होते
नही करते अगर बातें  खुद से
तो कैसे जान पाओगे मुझको ||

Friday, 7 July 2017

दूसरो की तलाश में

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय

जब भी भटकता हूँ किसी की तलाश में
थक कर पहुच जाता हूँ तुम्हारे पास में
तुम भी भटकती हो किसी की तलाश में
ठहर जाती हो आकर के मेरे पास में
हर दिन भटकते रहे चाहे इस दुनियाँ में
मिलते रहे आपस में दूसरो की तलाश में || 

Wednesday, 5 July 2017

कोई सहारा तो हो

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय

मिले नज़र फिर झुके नज़र, कोई इशारा तो हो
यो ही सही जीने का मगर, कोई सहारा तो हो ||

स्कूल दफ़्तर परिवार सबको हिस्सा दे दिया
जिसको अपना कह सके, कोई हमारा तो हो || 

उलझ गये है भँवर मे और उलझे ही जा रहे 
कोई राह नयी निकले, कोई किनारा तो हो || 

टूटे हुए सितारो से माँगते है सब फरियादें 
कुछ हम भी मांग ले, कोई सितारा तो हो ||

तुम्हे देख हर कोई नज़रिया बदल लेता है 
हम भी बदल .जाए, कोई नज़ारा तो हो || 

Sunday, 2 July 2017

दंगा

रेखा की इज़्ज़त लूटे और हमीर का घर जले
दंगा फिर हो कि, अख़बारो का कारोबार चले || 
@ #शिवदत्त श्रोत्रिय

Sunday, 28 May 2017

पिता के जैसा दिखने लगा हूँ मैं

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय

काम और उम्र के बोझ से झुकने लगा हूँ मैं
अनायास ही चलते-चलते अब रुकने लगा हूँ मैं
कितनी भी करू कोशिश खुद को छिपाने की
सच ही तो है, पिता के जैसा दिखने लगा हूँ मैं || 

Sunday, 7 May 2017

अच्छा लगता है

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय

कभी-कभी खुद से बातें करना अच्छा लगता है
चलते चलते फिर योहीं ठहरना अच्छा लगता है ||

जानता हूँ अब खिड़की पर तुम दिखोगी नहीं
फिर भी तेरी गली से गुजरना अच्छा लगता है ||

शाख पर रहेगा तो कुछ दिन खिलेगा तू गुल
तेरा टूटकर खुशबू में बिखरना अच्छा लगता है ||

आईने तेरी जद से गुजरे हुए जमाना हुआ
आजकल नज़रों में सँवरना अच्छा लगता है ||

जानता हूँ चाँद का घर है फलक के पास पर
चांदनी का जमीं पर उतरना अच्छा लगता है || 

Friday, 21 April 2017

भारत दिखलाने आया हूँ

रंग रूप कई वेष यहाँ पर
रहते है कई देश यहाँ पर
कोई तिलक लगाकर चलता
कोई टोपी सजा के चलता
कोई हाथ मिलाने वाला
कोई गले लगाकर मिलता
कितने तौर-तरीके, सबसे मिलवाने आया हूँ
क्या तुम हो तैयार? भारत दिखलाने आया हूँ


एक कहे मंदिर में रब है
दूजा कहे खुदा में सब है
तीजा कहे चलो गुरुद्वारा
चौथा कहे कहाँ और कब है
मैं कहता माँ बाप की सेवा
दुनिया में सबसे बड़ा मजहब है ||
हर बेटे को कर्त्तव्य, याद दिलवाने आया हूँ
क्या तुम हो तैयार? भारत दिखलाने आया हूँ |

कोई मांगे मंदिर के अंदर
कोई मांगे मंदिर के बाहर
कोई कहे मदीना घर में
कोई पाक बने मक्का जाकर
किसी के घर से खाना फिकता
कोई खाता घर घर से लाकर
हर कोई मांग रहा यहाँ, अनुबोध कराने आया हूँ
क्या तुम हो तैयार?, तुम्हे भारत दिखलाने आया हूँ  || 

Monday, 17 April 2017

मगर ये हो न सका

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय

मैंने एक ख्वाब देखा था, तुम्हारी आँखों में
हक़ीक़त बन जाये मगर ये हो न सका ||

एक कश्ती ले उतरेंगे समुन्दर की बाहों में
कोई मोड़ न होगा फिर अपनी राहों में
नीला आसमां होगा जिसकी छत बनाएंगे
सराय एक ही होगी ठहर जायेंगे निगाहों में
एक लहर उठाएँगी एक लहर गिराएगी
गिरेंगे उठेंगे मगर एक दूजे की बाँहों में ||
मगर ये हो न सका...

चलना साथ मेरे तुम घने जंगल को जायेंगे
किसी झरने किनारे कुछ पल ठहर जायेंगे
फूल, खुशबू, परिंदे और हवाओ का शोर
मगर एक दूजे की साँसे हम सुन पाएंगे
अम्बर ढका होगा जब पेड़ों की टहनियों से
कुछ रूहानी कहानियां आपस में सुनाएंगे ||
मगर ये हो न सका...

चलते साथ रेगिस्तान की उस अंतहीन डगर
आदि से अंत तक तुम्हारा हाथ थामे सफर
रेत की तरह न सूखने देंगे होठो को हम
निशा का घोर तम हो या कि फिर हो सहर
अनिश्चितताओं में निश्चिंत हो गुजरेगी रात
हम ही रहनुमां और हम ही हमसफ़र
मगर ये हो न सका......

होता भी कैसे मुकम्मल? एक ख्वाब था 
जमीं पर खड़े होकर माँगा माहताब था 
जलना था मुझे कि जब तक अँधेरा है 
पर कब तक जलता? एक चिराग था 
फिर भी अगर मिल जाते हम कहीं 
बराबर  कर देते बाकी जो हिसाब था 
मगर ये हो न सका ..... 

Friday, 24 March 2017

करो वंदना स्वीकार प्रभो

वासना से मुक्त हो मन,
    हो भक्ति का संचार प्रभो
जग दलदल के बंधन टूटे
    हो भक्तिमय संसार प्रभो ॥

वाणासुर को त्रिभुवन सौपा
    चरणों में किया नमस्कार प्रभो
भक्तो पर निज दृष्टि रखना
   करुणा बरसे करतार प्रभो ॥


कण-२ में विद्धमान हो नाथ
   तुम निराकार साकार प्रभो
दानी हो सब कुछ दे देते
    दे दो भक्ति अपार प्रभो ॥

अनसुना बचा नहीं कुछ तुमसे
  सुन लेना पापी की पुकार प्रभो
कुछ अच्छा मैंने किया नहीं
  दयनीय पर करो विचार प्रभो ॥

हो नाम तुम्हारा अंतः मन में
कर दो दूर विकार प्रभो
विनती मेरी शरण में ले लो
करो वंदना स्वीकार प्रभो ॥ 

Wednesday, 15 March 2017

अंतिम यात्रा

  अंतिम यात्रा, भाग -१

किसी की चूड़ियाँ टूटेंगी,
कुछ की उम्मीदे मुझसे
विदा लेगी रूह जब
मुस्करा कर मुझसे
कितनी बार बुलाने भी जो
रिश्ते नहीं आये
दौड़ते चले आएंगे वो तब
आँशु बहाये
कितने आँशु गिरेंगे तब
जिस्म पर मेरे
रुख्सती में सब खड़े होंगे
मेरी मिटटी को घेरे ||

अंतिम बार फिर नहलाया जायेगा
बाद सजाया जायेगा
अंतिम दर्शन है जल्दी आओ
कुछ को बुलाया जायेगा
अंतिम यात्रा होगी पर
मेरे कदम न हिलेंगे
कांधों पर लेकर कब तलक
सब दूर चलेंगे
समुन्दर कि जिसका कोई छोर नहीं
आँशु है सबके जल्दी रुकेंगें
शमशान तक सब जोश से आएँगे
घर पहुचने पर थकेंगे ||

जब अंतिम बार जला होगा
शरीर, मरघटी में
मेरी राख बहा दी गयी होगी
पानी की तलहटी में
ब्रह्मभोज खिलाओगे तुम कुछ
ब्रह्मिनो को बुलाकर
मेरी यादो समेट दोगे तस्वीर पर
फूलमाला चढ़ाकर
मेरी लाठी, मेरा चश्मा, मेरी डायरी
छिपा दोगे
मेरी शक्सियत का हर एक निशान
मिटा दोगे ||


क्या कोई मुझे भी याद करेगा?
मेरे बारे में कुछ बात करेगा,
उनकी सदा मुझ तक पहुचे कैसे भी
ऐसी कोई फ़रियाद करेगा ||