Sunday, 28 May 2017

पिता के जैसा दिखने लगा हूँ मैं

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय

काम और उम्र के बोझ से झुकने लगा हूँ मैं
अनायास ही चलते-चलते अब रुकने लगा हूँ मैं
कितनी भी करू कोशिश खुद को छिपाने की
सच ही तो है, पिता के जैसा दिखने लगा हूँ मैं || 

Sunday, 7 May 2017

अच्छा लगता है

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय

कभी-कभी खुद से बातें करना अच्छा लगता है
चलते चलते फिर योहीं ठहरना अच्छा लगता है ||

जानता हूँ अब खिड़की पर तुम दिखोगी नहीं
फिर भी तेरी गली से गुजरना अच्छा लगता है ||

शाख पर रहेगा तो कुछ दिन खिलेगा तू गुल
तेरा टूटकर खुशबू में बिखरना अच्छा लगता है ||

आईने तेरी जद से गुजरे हुए जमाना हुआ
आजकल नज़रों में सँवरना अच्छा लगता है ||

जानता हूँ चाँद का घर है फलक के पास पर
चांदनी का जमीं पर उतरना अच्छा लगता है || 

Friday, 21 April 2017

भारत दिखलाने आया हूँ

रंग रूप कई वेष यहाँ पर
रहते है कई देश यहाँ पर
कोई तिलक लगाकर चलता
कोई टोपी सजा के चलता
कोई हाथ मिलाने वाला
कोई गले लगाकर मिलता
कितने तौर-तरीके, सबसे मिलवाने आया हूँ
क्या तुम हो तैयार? भारत दिखलाने आया हूँ


एक कहे मंदिर में रब है
दूजा कहे खुदा में सब है
तीजा कहे चलो गुरुद्वारा
चौथा कहे कहाँ और कब है
मैं कहता माँ बाप की सेवा
दुनिया में सबसे बड़ा मजहब है ||
हर बेटे को कर्त्तव्य, याद दिलवाने आया हूँ
क्या तुम हो तैयार? भारत दिखलाने आया हूँ |

कोई मांगे मंदिर के अंदर
कोई मांगे मंदिर के बाहर
कोई कहे मदीना घर में
कोई पाक बने मक्का जाकर
किसी के घर से खाना फिकता
कोई खाता घर घर से लाकर
हर कोई मांग रहा यहाँ, अनुबोध कराने आया हूँ
क्या तुम हो तैयार?, तुम्हे भारत दिखलाने आया हूँ  || 

Monday, 17 April 2017

मगर ये हो न सका

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय

मैंने एक ख्वाब देखा था, तुम्हारी आँखों में
हक़ीक़त बन जाये मगर ये हो न सका ||

एक कश्ती ले उतरेंगे समुन्दर की बाहों में
कोई मोड़ न होगा फिर अपनी राहों में
नीला आसमां होगा जिसकी छत बनाएंगे
सराय एक ही होगी ठहर जायेंगे निगाहों में
एक लहर उठाएँगी एक लहर गिराएगी
गिरेंगे उठेंगे मगर एक दूजे की बाँहों में ||
मगर ये हो न सका...

चलना साथ मेरे तुम घने जंगल को जायेंगे
किसी झरने किनारे कुछ पल ठहर जायेंगे
फूल, खुशबू, परिंदे और हवाओ का शोर
मगर एक दूजे की साँसे हम सुन पाएंगे
अम्बर ढका होगा जब पेड़ों की टहनियों से
कुछ रूहानी कहानियां आपस में सुनाएंगे ||
मगर ये हो न सका...

चलते साथ रेगिस्तान की उस अंतहीन डगर
आदि से अंत तक तुम्हारा हाथ थामे सफर
रेत की तरह न सूखने देंगे होठो को हम
निशा का घोर तम हो या कि फिर हो सहर
अनिश्चितताओं में निश्चिंत हो गुजरेगी रात
हम ही रहनुमां और हम ही हमसफ़र
मगर ये हो न सका......

होता भी कैसे मुकम्मल? एक ख्वाब था 
जमीं पर खड़े होकर माँगा माहताब था 
जलना था मुझे कि जब तक अँधेरा है 
पर कब तक जलता? एक चिराग था 
फिर भी अगर मिल जाते हम कहीं 
बराबर  कर देते बाकी जो हिसाब था 
मगर ये हो न सका ..... 

Friday, 24 March 2017

करो वंदना स्वीकार प्रभो

वासना से मुक्त हो मन,
    हो भक्ति का संचार प्रभो
जग दलदल के बंधन टूटे
    हो भक्तिमय संसार प्रभो ॥

वाणासुर को त्रिभुवन सौपा
    चरणों में किया नमस्कार प्रभो
भक्तो पर निज दृष्टि रखना
   करुणा बरसे करतार प्रभो ॥


कण-२ में विद्धमान हो नाथ
   तुम निराकार साकार प्रभो
दानी हो सब कुछ दे देते
    दे दो भक्ति अपार प्रभो ॥

अनसुना बचा नहीं कुछ तुमसे
  सुन लेना पापी की पुकार प्रभो
कुछ अच्छा मैंने किया नहीं
  दयनीय पर करो विचार प्रभो ॥

हो नाम तुम्हारा अंतः मन में
कर दो दूर विकार प्रभो
विनती मेरी शरण में ले लो
करो वंदना स्वीकार प्रभो ॥ 

Wednesday, 15 March 2017

अंतिम यात्रा

  अंतिम यात्रा, भाग -१

किसी की चूड़ियाँ टूटेंगी,
कुछ की उम्मीदे मुझसे
विदा लेगी रूह जब
मुस्करा कर मुझसे
कितनी बार बुलाने भी जो
रिश्ते नहीं आये
दौड़ते चले आएंगे वो तब
आँशु बहाये
कितने आँशु गिरेंगे तब
जिस्म पर मेरे
रुख्सती में सब खड़े होंगे
मेरी मिटटी को घेरे ||

अंतिम बार फिर नहलाया जायेगा
बाद सजाया जायेगा
अंतिम दर्शन है जल्दी आओ
कुछ को बुलाया जायेगा
अंतिम यात्रा होगी पर
मेरे कदम न हिलेंगे
कांधों पर लेकर कब तलक
सब दूर चलेंगे
समुन्दर कि जिसका कोई छोर नहीं
आँशु है सबके जल्दी रुकेंगें
शमशान तक सब जोश से आएँगे
घर पहुचने पर थकेंगे ||

जब अंतिम बार जला होगा
शरीर, मरघटी में
मेरी राख बहा दी गयी होगी
पानी की तलहटी में
ब्रह्मभोज खिलाओगे तुम कुछ
ब्रह्मिनो को बुलाकर
मेरी यादो समेट दोगे तस्वीर पर
फूलमाला चढ़ाकर
मेरी लाठी, मेरा चश्मा, मेरी डायरी
छिपा दोगे
मेरी शक्सियत का हर एक निशान
मिटा दोगे ||


क्या कोई मुझे भी याद करेगा?
मेरे बारे में कुछ बात करेगा,
उनकी सदा मुझ तक पहुचे कैसे भी
ऐसी कोई फ़रियाद करेगा ||

Saturday, 25 February 2017

आया था चाँद पानी पर

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय

किसी ने उपमा दी इसे
महबूबा के चेहरे की,
किसी ने कहा ये रात का साथी है

कभी  बादल मे छिपकर
लुका छिपी करता तो ,
मासूम सा बनकर सामने आ जाता कभी

सदियों से बस वही है पर फिर भी
हर दिन कुछ बदल जाता है
अमावस्या से पूर्णिमा तक जीता है एक जिंदगी

खामोश है, बेजुबान रहा हमेशा
पर गवाही दे रहा है  
प्रेमी और प्रेमिका के मिलन की उस रात की

कौसल्या से बालक राम ने भी
जिद की थी चाँद की
झट फलक से उतर आया था चाँद पानी पर  ||

हर कहीं है जिक्र उसका 
सितारों ने भी घेरा है 
फिर भी लगता है चाँद आसमान में अकेला है ॥ 

Tuesday, 21 February 2017

अब आदाब करके

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय

मेरे गुनाहों को अब नजर अंदाज करके
बनाओ तुम मुझे, खुद को खराब करके ||

किस कदर टूट चुका है अब वो देख
रात गुजारता है, जिस्म को शराब करके ||

अपने हिस्से की चाहत चाहता हर कोई
चैन कहाँ है ,मोहब्बत बे- हिसाब करके ||

उजड़ा हुआ है यहाँ हर साख का मंजर
सोचा चमन से गुजरेगा सब पराग करके ||

ये शहर बड़ी जल्दी इतना बड़ा हो गया
मिलता नहीं गले कोई अब आदाब करके ||

तेरी हर राह में रोशनी तभी आयी है
माँ-बाप ने जलाया खुद को चराग़ करके ||

Wednesday, 15 February 2017

सुखद स्वास्थ का एक कण चाहता हूँ



न महलो की, जन्नत की चाहत हो कभी
सुखद स्वास्थ का एक कण चाहता हूँ ॥

हो जीवन सुगम और मिट जायें सब अधम
हर किसी के खातिर ऐसा कल चाहता हूँ

काम, क्रोध, मोह, मद ये जग के शिकारी
इनकी नजरों से बचा एक मन चाहता हूँ ॥

आँखे बंद करके जो बस तुझको निहारे
तुम्हारे दर्शन को मैं ऐसे नयन चाहता  हूँ ॥

जीवन के सफर में तुम, कभी मिलो ना मिलो
अंतिम सफर में हो सम्मुख, वह क्षण चाहता हूँ ॥   ...  शिवदत्त श्रोत्रिय

Thursday, 12 January 2017

याद से निकलकर

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय

तेरी यादो का तकिया लगा कर, 
हर रात सोता हूँ 
कभी तो ख्वाबो में आओगी तुम,
संभल- संभलकर 
या जब सुबह पहली किरण से 
नींद टूट जाएगी
तुम हकीकत बन जाओगी मेरी
याद से निकलकर ॥