Wednesday, 6 September 2017

फूलो के इम्तिहान का

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय

मंदिर में काटों ने अपनी जगह बना ली
वक़्त आ गया है फूलो के इम्तिहान का  ||

सावन में भीगना कहाँ जुल्फों से खेलना
बारिश में जलता घर किसी किसान का ||

हालात बदलने की कल बात करता था
लापता है पता आज उसके मकान का ||

निगाह उठी आज तो महसूस करता हूँ
लाल सा दिखने लगा रंग आसमान का ||

लुटेरों की हुक़ूमत जहाजों पर हो गयी
अंदाजा किसे है दरिया के नुकसान का ||

आइना कहाँ दुनियाँ की नजर में  "शिव"
अपने ही सबूत मांगते तेरी पहचान का ||

तबीयत बदल जाए

तबीयत से देख ले तुम्हे तो तबीयत बदल जाए, 
मेरा ईमान बदला है उनकी शरीयत बदल जाए || 
कवि: #शिवदत्त श्रोत्रिय

Wednesday, 30 August 2017

कितना कुछ बदल जाता है, आधी रात को


कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय

जितना भी कुछ भुलाने का
दिन में प्रयास किया जाता है
अनायास ही सब एक-एक कर
मेरे सम्मुख चला आता है
कितना कुछ बदल जाता है, आधी रात को....

असंख्य तारे जब साथ होते है
उस आसमान की छत पर
मैं खुद को ढूढ़ने लगता हूँ तब
किसी कागज़ के ख़त पर
धीरे धीरे यादों का एक फिर
घेरा सा बनता है
कोई किरदार जी उठता
कोई किरदार मरता है
मुकम्मल नहीं होता है यादों का बसेरा
रेत सा  बिखरता है
कुछ समेटकर उससे सम्हल जाता है
कितना कुछ बदल जाता है, आधी रात को....

सन्नाटे में जब तुम्हे सुनने की
आस जगती है
तुम्हारे लम्स को सोचूँ तो फिर
प्यास लगती है
कभी असीमित आकाश में वो
थक चुका पंछी
नहीं धरती कही उसको अब
पास दिखती है
एक आँख झूमती मस्ती में दूजी
उदास लगती है ||
जब एक आँख से हिमखंड
पिघल जाता है ||
कितना कुछ बदल जाता है, आधी रात को.... 

Sunday, 20 August 2017

बहुत बेशर्म है या ज़िद्दी

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय

वो लड़का जो कभी किताबों से मोहब्बत करता था
सुना है, आजकल मोहब्बत में किताबें लिख रहा हैं

पहले रास्ते की किसी सड़क के किसी मोड़ पर
या शहर के पुराने बाज़ार की किसी दुकान के काँच की दीवारों में कैद
किसी किताब को दिल दे बैठता था ||

आजकल वो अपना दिल हथेली पर रख कर घूमता है
उसी सड़क के मोड़ पर किसी दूकान या शॉपिंग मॉल के
एस्केलेटर से उतरती हुई लड़की को दिल देना चाहता है ||

किताबो के कवर की तरह ही वो चहरे पढ़ना चाहता है
और शायद वही गलती जानबूझकर दोहराना चाहता है
जो कि किताबों के कवर देखकर किताब उठाकर उसके अंदर की
कहानियो में फस कर करता था |
अब सड़क किनारें किताबों की दुकानों के प्रति उसका मोह
भंग हो चूका है
उसकी सोच का स्तर अब गिर चुका है या फिर किताबो का,
जब से उसने सड़क के फुटपाथ पर किताबो को बिकते हुए देखा है
जहाँ से वो कभी जूते खरीदा करता था ||

वो आज भी पढ़ना चाहता है, मगर केवल चहरे ...
पर शायद उसने ये हुनर सीखा नहीं है, वो पागल अभी भी
हर सीने में दिल ढ़ूढ़ने निकल पड़ता है ||
हर बार उसे पत्थर मिले है सीने में , पर पागल
ठोकरों से सम्हलता कहाँ है ?
लगता है बहुत बेशर्म है या ज़िद्दी।|

Sunday, 23 July 2017

एक प्लेटफार्म है

शहर की भीड़ भाड़ से निकल कर
सुनसान गलियों से गुजर कर
एक चमकता सा भवन
जहाँ से गुजरते है, अनगिनत शहर |

एक प्लेटफार्म है, जो हमेशा ही
चलता रहता है
फिर भी
वहीं है कितने वर्षो से |

न जाने कितनो  की मंजिल है ये
और कितने ही पहुंचे है
यहाँ से अपनी मंजिल
पर हर कोई  बे-खबर है |

कुछ लोग दिन गुजारते है कहीं
फिर शाम को लौट कर
बिछाते है प्लेटफार्म पर एक चादर
ये बन  जाता है, सराय |

रात के अँधेरे में चमचमाता
कई शहर  इंतजार में
उसी इंतजार में शामिल
आज मेरा भी नाम  || 

Monday, 17 July 2017

पर कौन सुनेगा उसकी ?

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय

शाम को आने में थोड़ी देरी
हो गयी उसको
घर का माहौल बदल चुका
था एकदम
वो सहमी हुई सी डरी डरी
आती है आँगन में
हर चेहरे पर देखती है
कई सवाल

सुबह का खुशनुमा माहौल
धधक रहा था अब
उसके लिए बर्फ से कोमल हृदय में
दावानल सा लग रहा था
वो खामोश रह कर सुनती है बहुत कुछ
और रोक लेती है नीर को
आँखो की दहलीज पर

पहुचती है अपने कमरे में
जहाँ वो रो सकती है
यहाँ उसे डर नही लगता है
रोने में
जहाँ की दीवारो पर नमी
हमेशा बरकरार ही रहती है
उसकी सबसे अज़ीज दुनियाँ
उस कमरे में ही है अब तक

कभी वो वहाँ एक स्वपन देखती
है, जिसमे चुन लेती है अपना राजकुमार
कभी खुशी में नाचने लगती है
अनायस्स ही कुछ सोचकर
कभी कभी तो आंशू भी गिर जाते है
हस्ते हस्ते उसकी आँखो से

समुद्र की लहरो की तरह
विचार आते है उसके मन में  भी
वो एक डोर से बधी है
जिसका छोर बहुत से हाथों में है
वो उड़ना चाहती है पतंग की
तरह
पर अपने ही आसमान में जहाँ
बाज और गिद्धों का ख़तरा ना हो

वो बुनती है उड़ानो के बटन
ख़यालो की कमीज़ में
कभी वो ओढ़ लेती है दुपट्टा पुराना
जिस पर कभी सितारे हुआ करते थे
वो रेडियो जॉकी बनना चाहती है
पर घर में  गुमसुम  ही रहती है ||

वो बहुत कुछ कहना चाहती है
पर कौन सुनेगा उसकी ?

Saturday, 15 July 2017

कैसे जान पाओगे मुझको

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय

अगर तुमने प्रेम नही किया
तो कैसे जान पाओगे मुझको

किसी को जी भरकर नही चाहा
किसी के लिए नही बहाया
आँखों से नीर  रात भर
किसी के लिए अपना तकिया नही
भिगोया कभी
नही रही सीलन तुम्हारे कमरे
मे अगर कभी
तो कैसे जान पाओगे मुझको ||

हृदय के अंतः पटल से
अगर नही उठी कभी तरंगे
नही बिताई रात अगर
चाँद और तारो के साथ
नही सुनी कभी नज़्म
साहिर, फ़ैज़ ग़ालिब, मीर , मज़ाज़ की
तो फिर तुम ही बताओ
कैसे जान पाओगे मुझको ||

अगर तुम तड़पते  नही की जैसे
चातक तरसता है बारिश के लिए
या मछली पानी से बाहर आकर,
तुम एक समुंदर के बीच पानी चारो ओर
पर उसमे से पी नही सकते
दो घूट भी तुम, महसूस  नही  किया है
भीड़ मे भी अगर तन्हा नही होते
नही करते अगर बातें  खुद से
तो कैसे जान पाओगे मुझको ||

Friday, 7 July 2017

दूसरो की तलाश में

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय

जब भी भटकता हूँ किसी की तलाश में
थक कर पहुच जाता हूँ तुम्हारे पास में
तुम भी भटकती हो किसी की तलाश में
ठहर जाती हो आकर के मेरे पास में
हर दिन भटकते रहे चाहे इस दुनियाँ में
मिलते रहे आपस में दूसरो की तलाश में || 

Wednesday, 5 July 2017

कोई सहारा तो हो

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय

मिले नज़र फिर झुके नज़र, कोई इशारा तो हो
यो ही सही जीने का मगर, कोई सहारा तो हो ||

स्कूल दफ़्तर परिवार सबको हिस्सा दे दिया
जिसको अपना कह सके, कोई हमारा तो हो || 

उलझ गये है भँवर मे और उलझे ही जा रहे 
कोई राह नयी निकले, कोई किनारा तो हो || 

टूटे हुए सितारो से माँगते है सब फरियादें 
कुछ हम भी मांग ले, कोई सितारा तो हो ||

तुम्हे देख हर कोई नज़रिया बदल लेता है 
हम भी बदल .जाए, कोई नज़ारा तो हो || 

Sunday, 2 July 2017

दंगा

रेखा की इज़्ज़त लूटे और हमीर का घर जले
दंगा फिर हो कि, अख़बारो का कारोबार चले || 
@ #शिवदत्त श्रोत्रिय