Friday, 5 February 2016

जख्म बहुत ही गहरा है

        कवि:  शिवदत्त श्रोत्रिय

कैसे दिखा दूँ, जख्म ये दिल का
ये जख्म बहुत ही गहरा है,
जुदाई तेरी जख्म बड़ाती
मरहम तेरा चेहरा है ||

ना जाने मैं कैसे तुझसे जुड़ा
    ये सवाल बहुत ही गहरा है,
तुमको सांसो मै छिपालू
    पर सांसो पर भी पहरा है||

तुम्हे सुनाता अपनी आवाज़
    शायद तुझे कुछ आए याद,
मेरी आवाज़ो का अर्थ ना निकला
    लगता है सनम मेरा बहरा है ||

ख्वाबों मै तुम मेरे ख्वाब मै आयीं
    वो ख्वाब बहुत ही गहरा था
घूँघट पहने तुम बैठी थी
    माथे पर मेरे सेहरा था ||

इससे पहले की घूँघट उठता
    मेरा थोड़ा सा गम घटता,
टूट गया वो मेरा सपना
    वक़्त जहा पर ठहरा था||

कैसे दिखा दूँ, जख्म ये दिल का
ये जख्म बहुत ही गहरा है||

Sunday, 15 November 2015

प्रमोशन माँगूँगा नही

कवि:- शिवदत्त श्रोत्रिय

वक़्त पर आ जाऊँगा,
        वक़्त से ना जाऊँगा
वक़्त ज़्यादातर मैं अपना
       ऑफीस में ही बिताऊँगा
हर दिन करूँगा काम पर
       रविवार जागूंगा नही||
 प्रमोशन माँगूँगा  नही...

ज़िम्मेदारियाँ सारी संभालूँगा
       जो भी तुम मुझसे कहो
पर लघुता ना तुम मेरी छुओ,
       हो मैनेजर तो बने रहो
इस हृदय की पीर है जो
       उसको त्यागूंगा नही||
 प्रमोशन माँगूँगा  नही...

रेटिंग A पाने की होड़ में
       मैं भी खड़ा हूँ दौड़ में,
यही पाने की लिए क्या
       आया हूँ परिवार छोड़ मैं|
पर किसी के अश्रु पर
       खुशी चाहूँगा नही||
 प्रमोशन माँगूँगा  नही...

हर बार जो मुझको मिला
       उसका नही मुझको गिला
लाखो लहरे टकराई
       किंतु कब पर्वत हिला
कर्तव्य अडिग पर्वत सा
       छोड़ भांगूँगा नही|
 प्रमोशन माँगूँगा  नही...

Sunday, 11 October 2015

विलक्षण मानव

मैने तुझको लिप्त है देखा
भोग विलास के प्रकारो में,
मैने तुझको जाते है देखा
    मंदिर मस्जिद गुरुद्वारो में |

भाई को भाई से लड़ते देखा
    लड़ते लड़ते मरते देखा
किसी अंजान की खातिर
    दुनिया से भी झगड़ते देखा |

देखा मैने तुझको खेलते
  नारी के अधिकारो से
कभी भरी कलाई देखी
  राखी के त्योहारो से |

मैने प्यार के धोखे में
अस्मत को भी लूटते देखा
बड़ी बड़ी दीवारो बीच
  नाज़ुक दिल को टूटते देखा |

एक मा को मैने रोते देखा
    बेटो को भूखे सोता देखा
दूर कही एक मंदिर में
    भंडारा भी होते देखा |

कई संस्कृति मिटाते देखा
    एक नई संस्कृति बनाते देखा
किसी और के सपनो पर
    सपनो का महल बनाते देखा |

किसी की खातिर जाल बिछाया
        उसी जाल में फसते देखा
कभी कभी तो बिना बात के
      रोते और फिर हसते देखा |

Friday, 18 September 2015

मल्लाह से नाव मॅंगा रहे

प्रभु खड़े गंगा किनारे केवट को बुलवा रहे
पार होने के लिए मल्लाह से नाव मगा रहे||

तो सुनकर एक मल्लाह चला आया प्रभु के पास मे,
और बोला, सुना है रज चरण से पत्थर उड़े आकाश मे||
जब पत्थर उड़े आकाश मे तो सामर्थ कहा फिर काठ मे
तो करले अपनी दूर सन्सय यो हरी बतला रहे.
पार होने के लिए मल्लाह से नाव मॅंगा रहे.......

फिर सहित सीता नाथ लक्ष्मण जा विराजे नाव मे,
मल्लाह ने बल्ली लगा कर नैया को छोड़ा धार मे,
फिर धीरे-2 जा उतारे पार मे.

तो क्या विदा दे दू इसे, कुछ पास ना सकुचा रहे
तो सीता बोली हरी से मन मे सकुचाओ मति,
है अँगूठी पास मे, इसको दे दीजे पति|
देखकर इस द्श्य कहा मल्लाह ने, कि दर्शन किए सो हो गति

मे नाथ माझी घाट का, संसार सागर के हो तुम
मेने किया है पार तुमको, मुझको लगाना पार तुम
तो देखकर इस  द्श्य  को देवता हर्षा रहे
पार होने के लिए मल्लाह से नाव मॅंगा रहे.......

Sunday, 16 August 2015

जैविक खेती

सूख रहा धरती का कण -2
       हरियाली मिटती जाती है,
शस्य श्यामला वसुंधरा की
       सुंदरता घटती जाती है||

गगन पवन मई जहर घुल रहा
      भूमि बन रही ऊसर बंजर,
रही धरोहर जो हम सबकी
      वही संपाति हो रही जर्जर||

प्राकृतिक संपदा उजड़ रही
       टूट रहा माटी से नाता,
धन की चाहत में मनुज का
       प्रेम धरती से घटता जाता||

धधकती है छाती धरती की
       वर्षा ने मुख मोड़ लिया,
हरियाली छाने के इंतेजार से
       पक्षियो ने नाता तोड़ लिया||

जैविक खेती अपनाने से
      जीवन सुखमय हो जाएगा
सम्मान भी वापस लौटेगा
       अमृतरस फिर भर जाएगा||

तुम बिन रह नही सकता

ये कहना ग़लत था मेरा,
       क़ि तुम बिन रह नही सकता||

एक अटूट भरोसा था
      पर अब वैसा व्यवहार नही|
बंधन टूट चुका है
      शायद दोनो में प्यार नही||
मेरे इल्ज़ामो की फेहरिस्त तो
     बड़ी लंबी है मगर सुन ले
तुझे बेवफा कह दे कोई
     ये मैं सह नही सकता||

ये कहना ग़लत था मेरा...

हर रोज तस्वीर से तुम्हारी
     तुम्हे महसूस करता हूँ|
तुम जा चुकी हो फिर भी
     तुम्हे खोने से डरता हूँ||
इंतजार तो आज भी है क़ि
     तुम लौट आओ कैसे भी
फिर भी अब खुद से
     ये मैं कह नही सकता ||

ये कहना ग़लत था मेरा...

कुछ अपने हसीन लम्हो को
      कागज पर सज़ा दिया|
तुम्हारी यादो को समेटा
      एक नगमा बना दिया||
हर दिन टूट जाता है कुछ मुझमे
      तुम्हे समेटने की चाहत में
फिर भी मुस्कराता हूँ मैं
      ये आंशू बह नही सकता||

ये कहना ग़लत था मेरा...

Monday, 13 July 2015

पापा कहाँ खो जाते हो|

शाम को ऑफीस से जब भी तुम घर आते हो,
सबसे पहले आकर के TV का बटन दबाते हो|
रिमोट उठाकर के मनपसंद channel लगते हो,
फिर चलचित्र की दुनिया मैं पापा कहाँ खो जाते हो||

ना जाने की फोन पर क्या-2 type करते रहते हो,
कभी-2 तो खुद से भी कुछ बाते करते रहते हो|
लगता है सबसे ज़्यादा phone आपको प्यारा है,
ऐसा लगने लगता है, जैसे झूठा साथ हमारा है||

मैं सुबह से शाम तक आप के इंतजार मैं रहता हूँ,
बातें आपसे करता हूँ, अपने मित्रो से कहता हूँ|
थके हारे जब भी पापा, ऑफीस से घर आते है,
भूल के सारी काम की चिंता, मुझको गले लगाते है||

मैं बोलू या चुप रहूं, पापा सब समझ जाते है
मेरी हर इच्छा को बिन बोले पूरी कर जाते हैं||

शायद मैं छोटा हूँ बहुत, आपकी मजबूरी को जानता नही
आपकी व्यस्तता के प्रति, ज़िम्मेदारी को पहचानता नही||
पर मेरा भी तो कुछ हक है, आपके साथ समय बिताने का|
माँ को गले लगाने का,फिर  संसार को भूल जाने का||

माना मोबाइल आपको बहुत प्यारा है, पर थोड़ा सा हक तो हमारा है
मोबाइल जितना अगर हो ना सके,TV जितना ही प्यार करो|
Office से घर आते ही, मुझको भी बाहों मे भरो|
सारी दुनिया के रिस्ते निभाते हो, बेटा बहुत याद आते हो
पापा, ऐसा कभी मुझसे भी कहो ||

Sunday, 5 July 2015

तुम्हारे हाथो में

अब सौप दिया इस जीवन का, सब भार तुम्हारे हाथो में,
है जीत तुम्हारे  हाथोमें ,  और  हार  तुम्हारे  हाथो  में.

मेरा निश्चय बस एक यही, एक बार तुम्हे पा जाऊ में,
अर्पण कर दू दुनिया भर का, सब प्यार तुम्हारे हाथोमे.

में जग में रहू तो ऐसे रहू, ज्यो जल में कमल का फुल रहे,
मेरे  सब  गुणदोष  समर्पित,  कर्तार   तुम्हारे  हाथो  में.

यदि मानव का मुझे जन्म मिले,तो तव चरणों एक पुजारी बनू,
ईस पूजक की  ईक -2  रगका, हो  तार  तुम्हारे  हाथो  में.

जब जब संसारका कैदी बनू, निष्काम भाव से कर्म करू,
फिर अंत समय में प्राण तजु,  साकार  तुम्हारे  हाथो में.

मुज्मे तुजमे बस भेद यही, में नर हूँ तुम नारायण हो,
में  हूँ  संसार  के  हाथो  में , संसार  तुम्हारे  हाथो   में…

Saturday, 13 June 2015

जख्म गहरा था

जख्म गहरा था मगर, हमने दिखाया ही नही|
उसने पूछा नही, हमने बताया ही नही||
कुछ ना समझे वो अगर, इसमे खता मेरी कहाँ|
हाल ए दिल हमने कभी उनसे छिपाया ही नही||
मेरी निगाहें है निगेहबान अभी तक उनकी|
जाने वाला तो कभी लौट कर आया ही नही||
याद तन्हाई मैं जब भी तेरी आयी हमको|
कैसे कह दूँ क़ि कभी अश्क बहाया ही नही||
तेरी दुनिया को हमारी ज़रूरत है सनम|
फिर ना कहना की कभी हमने बताया ही नही||

Sunday, 12 April 2015

मेरी परिभाषा

तुम मेरे सुने जीवन मे
कुछ पाने की एक आशा थी|
उन्मुक्त हो चला मै जिस पथ पर
उस पथ की अभिलाषा थी|
तुमको जानू, तुमको देखु
एक यही जिज्ञासा थी|
हर वक़्त जो मेरे मुख से निकले
तुम ऐसी एक भाषा थी|
कुल मिलाकर बोलू अगर मै
तो तुम मेरी परिभाषा थी||