Friday, 6 February 2015

मकान की यादे

मकान का बाहरी कमरा जहाँ दादा जी रहते थे|
ना जाने सोते थे कब, बस जागते रहते थे
पिताजी  डाँटते थे जब भी मुझे दादा जी बचाते थे
तुझसे कम सैतान है पापा से कहते थे
कमरे के बीच मे तखत पर दादा जी और उनकी छड़ी रहती थी
दाई तरफ दीवार मे एक दराज मे एक घड़ी रहती थी
दादाजी थे तो घर पर ,लगता था हमेशा एक पहरा था
रिश्तो को संजोये रखने का,हुनर उनके पास गहरा था
अब तो वहाँ बस उनकी तस्वीर और कुछ याद रहती है
जिसमे चेहरे की चमक कुछ धूल से धुंधली सी हो गयी है
कभी पापा साफ करते है कभी हवा साफ कर जाती है
घर मे कोई और तो बात नही करता
लगता है हवा ही दादाजी से कुछ बात कर जाती है ||

सुबह वो उसका ची-2 करके सबको उठा जाना
ज़रा सी आहट होने पर फुर्र से उड़ जाना
मकान के आँगन मे चिड़िया एक घोसला बनाती थी
दिन भर दाना चुंगती, नन्हे बच्‍चों को चुगांती थी
पर अब चिड़िया ने खुद को आँगन मे आने से रोक लिया है
क्यो की घर के आगन को उपरी मंज़िल की छत ने ढक लिया है
मकान की उपरी छत पर कुछ किरायेदार रहते है
जिनसे अब कुछ किराया और कुछ शोर आता है||


मकान का वो कमरा जहाँ पढ़ा करता था मै और भाई
किताब कापियो के अलावा वहाँ दिखता नही कोई
किताबो की जगह अब कम्प्यूटर तन्त्र ने लेली
पहले विधयालय नही जाते थे किताबो के बहाने से
अब बड़े-२ काम हो जाते है एक क्लिक दबाने से||

आज किताबो को पलटा मैने धूल हटाने के बहाने से
सूखा गुलाब निकला जो अमानत था किसी की एक जमाने से
किताबो के पन्नो पर जिनका नाम लिख रखा था
अब वो नाम काम आते है लॅपटॉप का पासवर्ड बनाने मे

जब किताबो की जगह ई-बुक ने ले ली
तो सोचता हूँ की इन सब किताबो का क्या होगा
हर पन्ने मे दफ़न कोई याद,ख्वाबो का क्या होगा
किताबो मे छिपी कहानियो के फरिस्तो का क्या होगा
किताबे माँगने गिरने उठाने के बहाने जो रिस्ते बनते  थे अब उन
रिस्तो का क्या होगा||

Sunday, 4 January 2015

मै अकेला ही था


मै रो रहा था जब
तब सब हस रहे थे
मै ठिठुर रहा था ठंड मे
सब कपड़ो को कस रहे थे
दुनिया नयी थी मेरे लिए
हर रिस्ता नया था
सब कहते थे घर मे
मेहमान आ गया था
कुछ समय पहले ये दुनिया ना थी
मै अकेला ही था, मै अकेला ही था||

बिगत बीस बरसो मे
कुछ नये रिस्ते बने थे
अचानक उन सबसे दूर
हम चल तो दिए थे
कुछ परिवार की अपेछाए
कुछ सपनो का ध्यान
जिसकी खातिर छोड़ा था
मैने अपना शहर और मकान
तब घर से दूर अन्जानो के बीच
मै अकेला ही था, मै अकेला ही था||

महफ़िल भरी हुई थी
मंच पर मै अकेला था
मेरे सामने भीड़ का
जैसे एक मेला था
मुख से कुछ शब्‍द बहे
और था चारो और कोलाहल
तालियो के स्वर से
गूँजायमान था पूरा माहौल
पर जब मंच से उतरा सिर उँचा करके तब
मै अकेला ही था, मै अकेला ही था||

भीड़ के साथ होते हुए भी
तन्हा ही सफ़र था अब
फिर से साथ आए है
मेरे जानने वाले जब
मेरी मिट्टी से बोल रहे थे
मुझसे वो बोले ही कब
उस वक़्त हस रहा था मै
पर रो रहे थे  सब
नभ का अवलोकन कर उस अंतिम सफ़र मे
मै अकेला ही था, मै अकेला ही था||

उनसे जब मेरी नज़र मिली

उनसे जब मेरी नज़र मिली
दिल मे मच गयी खलबली||

पर्दे ने चाँद छिपाया था
जिसे देखकर दिल भरमाया था
अब तक जो खामोश था दिल
वो गीत प्रेम के गाया था
दफ़न हो चुका था जो सैलाब
वो उमड़ के वापस आया था
जैसे की दरवाजे पर दस्तक देने
कोई नया मेहमान आया था
मेरी मायूशी मे जैसे कोई खुशी घुली
उनसे जब मेरी नज़र मिली ......

शाम का वक़्त हसीन था
मौसम भी रंगीन थी
दिल भी खामोश था
मुझको भी होश था
ना जाने फिर क्या हो गया
मै जाने कहा खो गया
रुख़ से पर्दा हटा
मै वही खो गया
एक पल भी ना मेरी नज़र हिली
उनसे जब मेरी नज़र मिली .......

उन नज़रो मे कुछ तो जादू था
जो दिल हुआ बक़ाबू था
मुस्कराहट दिल को मिली थी
जैसे जख्म को राहत मिली थी
लगा जैसे कुछ खो गया है
या कुछ पाने की चाहत मिली थी
अरसे बाद वो पल लोटने वाला है
ऐसी मेरे दिल को आहट लगी थी
लंबे इंतेजार के बाद दिल की खिड़की खुली
उनसे जब मेरी नज़र मिली .......

और वो कुछ ऐसे थी कि
दो नयन सुसोभित थे ऐसे
जैसे श्याम चरण मे रखे कमल
ओज भरा मुख रहा चमक
जैसे दुग्ध अनछुए रहे धवल
साँसे सुंगंधित हो रही ऐसे
जैसे पुष्पो का कोई उपवन
काया की तुलना ही क्या
जैसे ब्रह्मांड का समस्त धन||
उसे  देख मेरे दिल की धड़कन थम चली
उनसे जब मेरी नज़र मिली .......

Thursday, 1 January 2015

मेरा रखवाला सबसे बड़ा

मेरा रखवाला सबसे बड़ा
हर पल वो मेरे साथ खड़ा||

मुझको फिर क्या चिंता है
जब उनका हाथ रखा है
उनको तो सब सुलभ है
जिसमे हो मेरी भलाई
करते है प्रभु वो सदा ही
मुझको तो रहना है कृपा की छाया मे .....
मेरा रखवाला............

जब प्रभु के दर मे जाता
देख के मुझको आता
प्रभुजी यो मुझसे कह रहे है
दुखो से मत घबराना
बस मुझको आवाज़ लगाना
रक्षा करूँगा तेरी तूफ़ानो मे....
मेरा रखवाला............

बचपन से इनको जाना
इनको ही अपना माना
ये मेरे प्राणो के आधार है
जब मन मे कुछ दुविधा हो
आकर इनको बतलाना
तेरे सब काम होंगे इशारो मे...
मेरा रखवाला............

Wednesday, 24 December 2014

रेल से अजब निराली है

इस काया की रेल - रेल से अजब निराली है|
ज्ञान, धरम के पहिए लागे,
कर्म का इंजन लगा है आंगे,
पाप-पुण्य की दिशा मे भागे,
२४ घड़ी ये खुद है जागे,
शुरु हुआ है सफ़र अभी ये गाड़ी खाली है||
इस काया की रेल ............

एक  राह है रेल ने जाना
जिसको सबने जीवन माना
हर स्टेशन खड़ी ट्रेन है
अंदर आओ जिसको है जाना
झंडी हरी मिली रेल अब जाने वाली है||
इस काया की रेल ............

जिसको भी मंज़िल पहुचाया
उससे पुण्य का भाड़ा पाया
पाप की गठरी खूब कमाया
जिस पथिक को मार्ग गुमाया
मद योवन मे डूबी रेल ये रेल मतवाली है||
इस काया की रेल ............

पाप पुण्य का हिसाब मगाया
यॅम का आज निमंत्रण आया
गार्ड ने लाल झंडी दिखाया
आख़िरी स्टेशन बतलाया
अब कितना भी करलो जतन रेल नही चलने वाली है||
इस काया की रेल ............

Monday, 22 December 2014

मुझे चलना है बस चलने दो

मै राह चला हूँ प्रीत मिलन की
मुझे चलना है बस चलने दो ||

प्रीत लगी जब दिव्य ओज से
उस ओज मे जाकर मिलना है
मोह पतंगे को ज्वाला का
ज्योति मे जाकर जलना है
मन को निर्मल करने मे
तन जलता है तो जलने दो |
मै राह चला हूँ प्रीत मिलन की
मुझे चलना है बस चलने दो ||

हर एक बूँद का लक्ष्य नही
सागर मे विलीन हो जाना
जीवन दायिनि बनने के लिए
कुछ का घरा मे खो जाना
जीवन देने की चाहत मे
अस्तित्व खोता है तो खोने दो |
मै राह चला हूँ प्रीत मिलन की
मुझे चलना है बस चलने दो ||

शून्य से द्विगुणित होकर
हर अंक शून्य बन जाता है
श्याम विविर मे मिल करके
हर रंग श्याम बन जाता है
श्याम मिलन की चाहत मे
रंग ढलता है तो ढलने दो |
मै राह चला हूँ प्रीत मिलन की
मुझे चलना है बस चलने दो ||

दरिया को पार करने मे
पैरो पर कीचड़ लगता है
लेकिन पथिक कब राहो की
कठिनाइयो से डरता है
मिट्टी की इस काया पर
कीचड़ लगता है तो लगने दो |
मै राह चला हूँ प्रीत मिलन की
मुझे चलना है बस चलने दो||

Sunday, 23 November 2014

एक तुच्छ बूँद सा जीवन दे दो

फसल खड़ी है खेतो मे
उष्णता उन्हे जलाती है
धधक रही है धरती भी
पर बूँद नज़र नही आती है||

किनारे बैठ मै देख रहा
बच्चे जो मेरे झुलस रहे
दिन तपन लिए जब आता है
रात तारो से भर जाती है||

पक्षी भी तड़फ़ उठे अब तो
चातक भी थक कर चूर हुआ
धरती भी प्यासी है कब से
बरसात क्यो नही आती है||

मै भी तेरा ही एक अंश हू
अंश को थोड़ा जीवन दे दो
एक झलक दिखा दो बदली की
एक तुच्छ बूँद सा जीवन दे दो||

तुम्ही से जग की घटा निराली
तुम से ही वन मे हरियाली
तर्पण जो थोड़ा तुम कर दो
तो दूर हो ये बदहाली||

अगर तेरे कोई उपर है
कोई तेरा सर्वेस्वर है
तो उससे जाकर तू कह दे
कि वो मेरा भी ईश्वर है||

Wednesday, 19 November 2014

विज्ञान और धर्म



विज्ञान और धर्म की ऐसी एक पहचान हो
विज्ञान ही धर्म हो और धर्म ही विज्ञान हो|
आतंक हिंसा भेदभाव मिटें इस संसार से
एक नया युग बने रहे जहाँ सब प्यार से||
विज्ञान जो है सिमट गया उसकी नयी पहचान हो
मेरा तो कहना है, कि हर आदमी इंशान हो||
हर आदमी पढ़े बढ़े नये-2 अनुसंधान हो
उन्नति के रास्ते चले, पर सावधान हो||
प्यार का संवाद समस्त विश्व के दरमियान हो
महानता का वर्चस्व लिए विज्ञान ही महान हो||

Thursday, 23 October 2014

इस बार नही आ पाऊँगा

दुख शायद तुमको भी होगा,
पर खुश मैं भी ना रह पाऊँगा|
कोशिश तो मैं बहुत करूँगा
पर इस बार नही आ पाऊँगा||

ह्रदय विषप्त मेरा भी होगा
नयनो मे नीर आ जाएगा
दहलीज पर लड़ते लड़ते हा
आंशु फिर से मर जाएगा||
उत्तरदायित्वओ से दबा हुआ हू
इतनी जल्दी ना जीत पाऊँगा
पर मन मैं एक विश्वास है
जल्दी घर वापस आऊँगा||
कोशिश तो मैं बहुत करूँगा
पर इस बार नही आ पाऊँगा.......

जब सूरज की मध्यम किरण
चौखट को छूने आएगी
हवा भी जब भीगी -2
खुश्बू हर तरफ महकाएगी|
घर के आगन मे बैठे जब
सब गीत खुशी के गाएँगे
मन ही मन गुनगुनता रहूँगा
पर साथ नही गा पाऊँगा||
कोशिश तो मैं बहुत करूँगा
पर इस बार नही आ पाऊँगा..........

Thursday, 2 October 2014

धूम्रपान

गॉव-२ और गली-२ मे
फैल गया इसका कहर
संसार की सर्वाधिक बिक्री
वाला ये स्वादिष्ट जहर||

धूम मचा दे रंग जमा दे
जीते जी अर्थी उठवा दे
जिन्दो की अर्थी उठवाये
फिर भी बेवखूफ़ गुटका खाए||

हुई नपुंसक युवा पीढ़ी
केंसर ने किया अट्टहास
दातो का हुआ कबाड़ा
सेहत का हो गया सत्यानाश||

अक्ल का अँधा खाने वाला
जहर खरीद कर ख़ाता जाए
पैसे निर्माता देखो कैसे
जहर बेचकर माल कमाए||


रंग बिरंगे पैकेट मे है
ज़हरीला पान मसाला
केंसर की प्रयोगशाला
बन गया है खाने वाला|

गुटका हँस -२ के कहता है
मै कितना सर्वव्यापी हूँ,
हे मूर्ख मुझे खाने वाले
मै यमराज की कार्बन कापी हूँ|