Sunday, 7 August 2016

लाजबाब हो गयी

चाहने वालो के लिए एक ख्वाब हो गयी सब कहते है क़ि तू माहताब हो गयी जबाब तो तेरा पहले भी नही था पर सुना है क़ि अब और लाजबाब हो गयी|| कवि:- शिवदत्त श्रोत्रिय

Thursday, 4 August 2016

प्यार नाम है

कवि:- शिवदत्त श्रोत्रिय

प्यार नाम है बरसात मे एक साथ भीग जाने का
प्यार नाम है धूप मे एक साथ सुखाने का ||

प्यार नाम है समुन्दर को साथ पार करने का
प्यार नाम है कश्मकस मे साथ डूबने का||

प्यार नाम है दोनो के विचारो के खो जाने का
प्यार नाम है दो रूहो के एक हो जाने का||

प्यार नाम नही बस एक दूसरे को  चाहने का
प्यार नाम है परस्पर प्रति रूप बन जाने का ||

प्यार नाम है एक साथ कुछ कमाने का
प्यार नाम है एक साथ सब कुछ लुटाने का||


Wednesday, 3 August 2016

अगर भगवान तुम हमको, कही लड़की बना देते

कवि:- शिवदत्त श्रोत्रिय

अगर भगवान तुम हमको, कही लड़की बना देते
जहाँ वालों को हम अपने, इशारो पर नचा देते||

पहनते पाव मे सेंडल, लगते आँख मे काजल
बनाते राहगीरो को, नज़र के तीर से घायल ||

मोहल्ले गली वाले, सभी नज़रे गरम करते
हमे कुछ देख कर जीते, हमे कुछ देख कर मरते||

हमे जल्दी जगह बस मे, सिनेमा मे टिकट मिलती
किसी की जान कसम से, हमारी कोख मे पलती ||

अगर नाराज़ हो जाते, कई तोहफे मॅंगा लेते
किसी के तोहफे नही भाते, तो तोहमत लगा देते||

अगर भगवान तुम हमको, कही लड़की बना देते||

Monday, 1 August 2016

फ़ौज़ी का खत प्रेमिका के नाम

कवि:- शिवदत्त श्रोत्रिय

कितनी शांत सफेद पड़ी
        चहु ओर बर्फ की है चादर
जैसे कि स्वभाव तुम्हारा
        करता है अपनो का आदर||

जिस हिम-शृंखला पर बैठा
        कितनी सुंदर ये जननी है|
बहुत दिन हाँ बीत गये
        बहुत सी बाते तुमसे करनी है||

कभी मुझे लूटने आता है
        क्यो वीरानो का आगाज़ करे
यहाँ दूर-२ तक सूनापन
        जैसे की तू नाराज़ लगे||

एक चिड़िया रहती है यहाँ
        पास पेड़ की शाखो पर
ची ची पर उसकी खो जाता हूँ
        जैसे सुध खोता था तेरी बातो पर||

मै सुलझाता हूँ उलझनो को
        जैसे सुलझाता था तेरे बालो को
कभी फिसल जाता हूँ लेकिन
        जैसे पानी छू गिरता गालो को||

कभी तुझे सोच कर हस लेता
        कभी तुझे सोचकर रो लेता
एक तेरा दुपट्टा  ले आया हूँ
        उसको आंशूओ से धो लेता ||

एक शपथ ली थी आते हुए
        सर्वोपरि राष्ट्रधर्म निभाऊँगा
मिलने का मन तो बहुत है
        पर अभी नही आ पाऊँगा||

Friday, 29 July 2016

मैने तुम पर गीत लिखा है

कवि:- शिवदत्त श्रोत्रिय
एक नही सौ-२ है रिस्ते
है रिस्तो की दुनियादारी,
कौन है अपना कौन पराया
जंजीरे लगती है सारी
तोड़के दुनिया के सब बंधन
तुमको अपना मीत लिखा है||
मैने तुम पर गीत लिखा है…
देख कर तुमको सोचा मैने
क्या इतनी मधुर ग़ज़ल होती है?
जैसे तू ज़ुल्फो को समेटे
वैसे क्या रागो को पिरोती है?
खोकर तेरे अल्हड़पन मे
तेरी धड़कन को संगीत लिखा है||
मैने तुम पर गीत लिखा है…
क्या मोल है तेरा ये बतला,
अपना अभिमान भी बेच दिया
पाने की खातिर तुझको,
मैने सम्मान को बेच दिया
सबकुछ खोकर है तुमको पाना
हार को अपनी जीत लिखा है||
मैने तुम पर गीत लिखा है…

Wednesday, 6 July 2016

क्यो कहते हो मुझे दूसरी औरत

कवि:- शिवदत्त श्रोत्रिय

मै गुमनाम रही, कभी बदनाम रही
मुझसे हमेशा रूठी रही शोहरत,
तुम्हारी पहली पसंद थी मै
फिर क्यो कहते हो मुझे दूसरी औरत ||

ज़ुबान से स्वीकारा मुझे तुमने
पर अपने हृदय से नही,
मै कोई वस्तु तो ना थी
जिसे रख कर भूल जाओगे कहीं
अंतः मन मे सम्हाल कर रखो
बस इतनी सी ही तो है मेरी हसरत
पर क्यो कहते हो मुझे दूसरी औरत||

तुम्हारे प्यार के सागर से
मिल जाते अगर दो घूट
अमृत समझ कर पी लेती
फिर चाहे जाते सारे बँधन छूट
खुदा से मांगती तो मिल गया होता
तुमसे माँगी थी थोड़ी सी मोहब्बत
पर क्यो कहते हो मुझे दूसरी औरत||

Tuesday, 5 July 2016

हम बनाएँगे अपना घर

होगा नया कोई रास्ता
  होगी नयी कोई डगर
छोड़ अपनी राह तुम
चली आना सीधी इधर||

मार्ग को ना खोजना
ना सोचना गंतव्य किधर
मंज़िल वही बन जाएगी
साथ चलेंगे हम जिधर||

कुछ दूर मेरे साथ चलो
तब ही तो तुम जानोगी
हर ओर अजनबी होंगे
लेकिन ना होगा कोई डर ||

तुम अपनाकर मुझे
अपना जब बनाओगी सुनो
हम तुम वही रुक जाएँगे
होगा वही अपना शहर||

खुशियाँ, निष्ठा, समर्पण,त्याग, सम्मान की
ईट लगाएँगे जहाँ
प्रेम के गारे से जोड़
हम बनाएँगे अपना घर ||

                         ©  शिवदत्त श्रोत्रिय

Tuesday, 28 June 2016

मेरी जिंदगी मे चले आए है

कवि:- शिवदत्त श्रोत्रिय

हर किसी को आज है, इंतेजार महफ़िल मे मेरा
फिर भी लगता है कि , बस हम ही बिन बुलाए है||

मोहब्बत अगर गुनाह, फिर हम दोनो थे ज़िम्मेदार
महफिले चाँदनी तुम, हम सरे बज्म सर झुकाए है||

खामोशी उनकी कहती है, कुछ टूटा है अन्दर तक
लगता है जैसे मेरी तरह, वो जमाने के सताए है ||

वैसे क्या कम सितम, जमाने ने मुझ पर ढहाए है
जो वो फिर से आज, मेरी जिंदगी मे चले आए है||

Monday, 27 June 2016

रोटी को मोहताज

कल सुबह से घर पर बैठे-२ थक चुका था और मन भी खिन्न हो चुका था शुक्रवार और रविवार का अवकाश जो था, तो सोचा कि क्यो ना कही घूम के आया जाए| बस यही सोचकर शाम को अपने मित्र के साथ मे पुणे शहर की विख्यात F. C. रोड चला गया, सोचा क़ि अगर थोड़ा घूम लिया जाएगा तो मन ताज़ा हो जाएगा, थकान दूर हो जाएगी||

         शाम के करीब ७ बजे थे, बहुत ही व्यस्त जीवनशेली के बीच लोग व्यस्तता के मध्य से समय निकाल शहर की सबसे व्यस्त सड़को पर घूमने आते है,कोई महँगी-२ कार चलाकर आया है तो कोई साथ मे ड्राइवर लाया है| पर यहाँ का नज़ारा भी अपने आप मे बहुत विचित्र होता है, सड़क के दोनो किनारे पगडंदियो पर लोगो का सैलाब और हज़ारो नज़रे कुछ ढूंडती हुई, लगे कि जैसे सबको किसी ना किसी चीज़ की ना जाने कब से तलाश है|

        कुछ ही समय मे मै भी उस भीड़ का हिस्सा बन कर कही खो गया, बस चला जा रहा था एक ही दिशा मे| सड़क के दोनो किनारे दुकानो की कतारे जैसे कि अपने गाँव मे मेले मे होती थी और इन दुकानो पर लोगो का हुजूम लगे की मानो मंदिर मे प्रसाद बॅट रहा है| कुछ दुकाने कपड़ो की खरीदारी के लिए, तो कुछ खाने के शौकीन लोगो के लिए पूरी तरह से समर्पित लग रही थी| थोड़ी देर मै भी इसी भीड़ मे खोया रहा, अपने मित्र के कहने पर एक पोशाक भी खरीद ली और वापस लौटने का निर्णय किया||

        वापस लौटने के लिए मैने जैसे ही बाइक पार्किंग एरिया से बाहर निकली, एक व्यक्ति जो की साइकल पर था पास आकर बोला- "सर, आप एक गुब्बारा खरीद लीजिए मेरी बेटी भूखी है सुबह से कुछ नही खाया है हम दोनो ने, मै भूखा सो सकता हूँ पर बच्चा नही सो पाएगा" | एक पुरानी सी साइकल जिस पर कुछ गुब्बारे लगे थे, साथ मे ही एक गंदा सा थैला लटका था जिसमे शायद कुछ रखा था, साइकल के आंगे फ्रेम पर एक छोटी सी(शायद २ या ३ साल की) लड़की बैठी थी जिसको देख कर लगा की ना जाने कब से भूखी है, मुझे लगा क़ि
ये अचानक मै कहाँ आ गया हूँ ? क्या अभी भी लोग २ वक़्त की रोटी को मोहताज है? क्या लोग अपने आसपास की वास्तविकता को देखना नही चाहते? क्या हम सब अपने आप तक सीमित हो चुके है? कहाँ है रोज़गार गारंटी क़ानून ? ऐसे ही ना जाने कितने सवालो को अपने मन मे लिए, उस साइकल वाले व्यक्ति के हाथ मे कुछ पैसे थमा कर वापस चला घर आया||

Sunday, 19 June 2016

तब तक समझो मे जिंदा हूँ

कवि:- शिवदत्त श्रोत्रिय

जब तक आँखो मे आँसू है
तब तक समझो मे जिंदा हूँ||

धरती का सीना चीर यहाँ
निकाल रहे है सामानो को
मंदिर को ढाल बना अपनी
छिपा रहे है खजानो को|
इमारतें बना के उँची
छू बैठे है आकाश को
उड़ रहे हवा के वेग साथ
जो ठहरा देता सांस को|
जब तक भूख ग़रीबी चोराहो पर
तब तक मै शर्मिंदा हूँ||

जब तक आँखो मे आँसू  है
तब तक समझो मे जिंदा हूँ||

जनता का जनता पर शासन
जनता से है छीन लिया
जनता को जनता से डराए
जनता ने जब उसे चुन लिया|
घोर अंधेरा गलियो मे
चोराहो पर सन्नाटा है
निर्दोष गवां दे जान यहाँ
आरोपी समझे वो टाटा है|
संसद के सिंघासन बैठा
धृतराष्ट्र कहे मै अंधा हूँ||

जब तक आँखो मे आँसू है
तब तक समझो मे जिंदा हूँ||